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तृणमूल स्तर पर कार्य करने वाले स्वैच्छिक संगठनों के लिए एच.आई.वी. एवं एड्स विषय पर संप्रेषण
मार्गदर्शिका

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आगे बढ़ कर नेतृत्व करते हुए - भारत में पुलिस और एचआईवी/एड्स कार्यक्रमन (पोस्टर)
नई दिल्ली, 10 अप्रैल 2008

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नई सुरक्षा समस्या - वर्दीधारी सेवाओं के संदर्भ में एचआईवी/एड्स (पुलिस एडवोकेसी ब्राशर)
नई दिल्ली, 10 अप्रैल 2008

 

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यूएनजीएएसएस(UNGASS) देश प्रगति रिपोर्ट - 2008 भारत

 

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औषधियों का नशीली दवा के इंजेक्शन लगाने के लिए उपयोग और दक्षिण एशिया क्षेत्र में एचआईवी की महामारी'' विषय पर सम्मेलन की रिपोर्ट
नई दिल्ली, 7 अप्रैल 2008

इस सम्मेलन ने दक्षिण एशिया में नुकसान-कभी हस्तक्षेपों को बढ़ाने तथा प्रिस्क्रिप्शन औषधियों की ब्रिकी पर उपयुक्त नियंत्रण लागू करने की फौरी जरूरत को उजागर किया। सम्मेलन में भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बंगलादेश और श्रीलंका के 120 पेशेवर कर्मियों और संसाधन व्यक्तियों ने भाग लिया जिनमें एचआईवी/एड्स के साथ जीने वाले लोग, सरकारी अधिकारी, अनुदानकर्ता, नीति-निर्माता, कानूनी कार्यकर्ता और गैर-सरकारी संगठनों के कार्यकर्ता शामिल थे। यह रिपोर्ट विचार-विमर्शों के सारांश तथा राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर नीति-निर्माताओं के साथ पैरवी के लिए मुख्य सिफारिशें प्रस्तुत करती है।

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तकनीकी रिपोर्ट
भारत एचआईवी आकलन - 2006
23 जनवरी 2008

वयस्क एचआईवी व्याप्ति पिछले पांच वर्षों में और 2002 में 0.45 प्रतिशत तथा 2006 में 0.36 प्रतिशत के बीच घटते-बढ़ते हुए 0.4 प्रतिशत पर स्थिर रही। 2006 में एचआईवी के साथ जीने वाले सभी लोगों की संख्या 24 लाख 70 हजार थी। इनमें 4 प्रतिशत बच्चे, 8 प्रतिशत 49 वर्ष से अधिक आयु के थे और बाकी 88 प्रतिशत 15-19 वर्ष आयु-समूह के थे। विभिन्न जोखिमपूर्ण समूहों के बीच व्याप्ति गिरते हुए क्रम में इस प्रकार थी: आईयूडीज, समलैंगिक पुरुषों, महिला यौनकर्मियों, लंबी दूरी के ट्रक चालकों और आम आबादी के मामले में क्रमश: 8.7 प्रतिशत, 5.7 प्रतिशत, 5.4 प्रतिशत और 0.3 प्रतिशत।

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पंजाब और हरियाणा में नशीली दवा का इंजेक्शन लगाने वालों का आकार आकलन - 2008
2 जनवरी 2008

इस अध्ययन के निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि सर्वेक्षण के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र में नशीली दवा का इंजेक्शन लगाने वालों की काफी बड़ी आबादी को लेकर हस्तक्षेपों की जरूरत है। सभी आयु समूहों में नशीली दवा का इंजेक्शन लगाने वाले मिल जाते हैं, पर समाज के बेरोजगार और अकुशल हिस्सों के बीच इनकी संख्या ज्यादा है। दवा की पर्ची आसानी से मिलने इस नशे की लत को बढ़ावा मिला है।

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2007 एड्स महामारी अपडेट
19 नवम्बर 2007

ये भूमंडलीय एड्स महामारी के सबसे ताजा घटनाक्रम पर 2007 एड्स महामारी रिपोटर् हैं। 2007 का यह संस्करण एड्स महामारी के सबसे ताजा आकलन प्रस्तुत करता है और इस महामारी के विकास संबंधी नयं निष्कर्षों और रूझानों की छानबीन करता है।

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सार्वजनीन पहुंच महलकदमी के नागरिक समाज की भागीदारी के न्यूनतम मानक
नई दिल्ली, 1 अगस्त 2007

सार्वजनीन पहुंच पहलकदमी का संबंध वर्ष 2010 तक जरूरतमंद लोगों को एचआईवी रोकथाम, उपचार, देखरेख और सहायता में वृध्दि करने के लक्ष्य के प्रति समर्पित राष्ट्र संघ सदस्य राज्यें की वचनबध्दता से है। सार्वजनीन पहुंच प्रक्रिया और एचआईवी और एड्स को लेकर राष्ट्रीय प्रत्युत्तर से जोड़ा जाएगा और राष्ट्रीय, क्षेत्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसकी मानीटरिंग की जाएगी। यह दस्तावेज - जिसे एशिया-प्रशांत क्षेत्र के नागरिक समाज संगठनों से राय और सुझाव लेकर तैयार किया गया है - सार्वजनीन पहुंच प्रक्रियाओं में नागरिक समाज की भागीदारी के न्यूनतम मानकों को प्रोन्नत करने की एक प्रक्रिया और ढांचा प्रस्तावित करता है। दूसरे शब्दों में इसका अर्थ यह है कि सरकारों और नागरिक समाज द्वारा सार्वजनीन पहुंच में नागरिक समाज की भागीदारी के लिए शर्तों, कार्रवाइयों, अनुपालन आदि को एक न्यूनतम स्तर तक पूरा किया जाएगा।

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'एचआईवी और एड्स इंडिया' के लिए राष्ट्र संघ की संयुक्त सहायता योजना (2007-2011)
नई दिल्ली, 1 अगस्त 2007

यह संयुक्त राष्ट्र संघ योजना भारत में एचआईवी और एड्स नियंत्रण कार्यक्रमों में राष्ट्र संघ प्रणाली के योगदान को दर्शाती है। यह राष्ट्र संघ प्रणाली के लिए एक ऐसी कार्य योजना का काम करेगी जिसे एचआईवी और एड्स पर राष्ट्र संघ विषय-समूह द्वारा मानीटर किया जाएगा और वार्षिक रूप से अधुनातन बनाया जाता रहेगा और यह कार्य भारत सरकार के बहुक्षेत्रीय प्रत्युत्तर के साथ घनिष्ठ संपर्क के माध्यम से किया जाएगा।

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एचआईवी और एड्स पर एक विकेंद्रीकृत प्रत्युत्तर का सुद्दढ़ीकरण
1 जुलाई, 2007

एचआईवी और एड्स पर बिहार विधायक फोरम की भामगंज पहलकदमी पर रिपोर्ट।

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एचआईवी और एड्स से लड़ने के लिए स्थानीय प्रत्युत्तर और समन्वयन को मजबूत बनाना - जिला परिषद अध्यक्षों और मेयरों का एचआईवी/एड्स सम्मेलन
नई दिल्ली, 8 अगस्त 2006

एचआईवी और एड्स के स्थानीय प्रत्युत्तर के सुद्दढ़ीकरण के लिए, पीएफए ने एचआईवी और एड्स पर जिला परिषद अध्यक्षों और मेयरों के लिए नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित की गई। इसे नैको और एचआईवी/एड्स पर राष्ट्र संघ कार्यक्रम (यूएनएड्स) ने संयुक्त रूप से आयोजित किया था। यह ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के स्थानीय रूप से निर्वाचित समुदाय के साथ साझेदारी का एक अवसर था।

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विधायकों ने की अगुवाई: बिहार एचआईवी/एड्स फोरम आरंभ करने पर यूएनएड्स की रिपोर्ट
24 जून 2006

राज्य में बढते हुए संक्रमणों से सतर्क होकर और इस महामारी पर अंकुश लगाने हेतु सघन प्रयासों की जरूरत महसूस करते हुए, बिहार के राजनीतिज्ञ इस महामारी के विरूध्द संघर्ष में शामिल हो गये हैं और उन्होंने बिहार एचआईवी और एड्स विधायक फोरम का गठन किया।

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''अधिक, बेहतर और अधिक तेज...........''
एचआईवी, टीबी और मलेरिया का मुकाबला: एशिया के पणधारियों की बैठक
नई दिल्ली, 4-7 अप्रैल 2006

इस परामर्श बैठक ने एचआईवी/एड्स, टीबी और मलेरिया के प्रबंधन के मुद्दों की बेहतर समझ प्रदान की है। बैठक में एशियाई क्षेत्र के 300 सहभागी उपस्थित थे। उन्होंने विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श करने के बाद तीनों रोगों के प्रबंधन के संबंध में साथ ही, नीति, वित्ता एवं शोध संबंधी मुद्दों पर अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कीं। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि इस सम्मेलन ने क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ाने तथा इन रोगों के विरुध्द भूमंडलीय युध्द में एशिया के योगदान को बढ़ाने का अवसर प्रदान किया।

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दक्षिण एशिया के लिए एचआईवी/एड्स चुनौतियों के जेंडर संबंधी आयाम
1 अगस्त, 2004

यह आलेख दक्षिण एशियाई संदर्भ में जेंडर और एचआईवी/एड्स के बीच के संबंधों का विश्लेषण करने का प्रयास करता है। क्षेत्र के सात देशों के बीच हुए विचार-विमर्श की परिणति जेंडर और एचआईवी/एड्स पर क्षेत्रीय परामर्श में हुई जिसे मई 2004 में यूनिफेम के क्षेत्रीय कार्यालय और यूएनएड्स की दक्षिण एशिया अत:- देश टीम द्वारा किया गया। यह आलेख कानूनी और नीतिगत ढांचे तथा महिलाओं की स्थिति का जायजा लेते हुए जेंडर एवं एचआईवी/एड्स के बीच संबंधी पर इस क्षेत्र में आरंभ की गई पहलकदमियों पर प्रकाश डालता है और अंत में यानी कार्रवाई के लिए सिफारिशें प्रस्तुत करता है।

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भारत में एचआईवी/एड्स को प्रत्युत्तर (एचआईवी/एड्स पर विस्तारित विषय समूह)
1 जून 2004

यह रिपोर्ट भारत सरकार की प्राथमिकताओं के समर्थन में एचआईवी/एड्स पर विषय समूह के सदस्यों द्वारा सामूहिक और व्यक्तिगत रूप से चलाये गये कार्यक्रमों और कार्यकलापों के मुख्य पहलुओं को प्रस्तुत करती है।

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स्वास्थ्य देखरेख क्षेत्र और कार्य की दुनिया में लांछना और भेदभाव में कमी लाने के लिए जीपा (जीआईपीए) आधारित हस्तक्षेप
1 मार्च 2004

इस अध्ययन का उद्देश्य नई दिल्ली में लांछना और भेदभाव में कमी लाने की जीपा-आधारित पहलकदमियों की महत्वपूर्ण सीखों को प्रस्तुत करना था। अन्य के अलावा, दिल्ली के एचआईवी पाजिटिव लोगों के नेटवर्क (डीएनपी+) और सहारा के प्रयासों से स्वास्थ्य देखरेखकर्मियों का संवेदीकरण हुआ और दिल्ली में एचआईवी/एड्स के साथ जीने वाले लोगों के एक समूह के प्रति भेदभाव में कमी आई।

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दक्षिण एशिया में एड्स संबंधी लांछना और भेदभाव को चुनौती
11 फरवरी 2004 - 26 मार्च 2004

एड्स-लांछना पर ई-फोरम को यूएनएड्स-एसएआईसीटी ने टाटा समाज विज्ञान संस्थान के सहयोग से 18 फरवरी, 2004 को आरंभ किया और इसे पांच सप्ताह तक संचालित किया गया।

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'और जानें' से अब और एड्स नहीं तक
एक जनवरी 2004

एड्स का संबंध जितना जीववैज्ञानिक और चिकित्सक सरोकारों से है उतना ही सामाजिक और राजनैतिक परिघटनाओं से संबंधित भी है।

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एचआईवी/एड्स पर मुकाबला करने में राजनितिक नेतृत्व की भूमिका
नई दिल्ली, 26-27 जुलाई 2003

एचआईवी/एड्स पर पूरे भारत के निर्वाचित प्रतिनिधियों का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन 26-27 जुलाई 2003, को आयोजित किया गया। इसमें एचआईवी/एड्स कर मुकाबला करने में राजनितिक नेतृत्व की भूमिका पर विचार किया गया। यह राजनितिक नेताओं का विश्व में अपनी ताह का पहला सम्मेलन था। देश भर से आये महिला और पुरूष जो विधायकों के रूप में अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों से चुनकर आये थे, दिल्ली के विज्ञान भवन में एकत्र हुए। यह एकजुटता और प्रतिबद्वता की एक अनूठा और स्मरणीय प्रर्दशन था।

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आरवान
अनीता खेमका के फोटोग्राफ
पाठ-लेखन जी प्रमोद कुमार द्वारा
1 जनवरी 2002

साल में अधिकतर समय दक्षिण भारत से 200 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कुवागम नामक अज्ञात-सा गांव शांत और एकाकी रहता है। पगडंडियों से घिरा; फूस के मकानों वाला तथा आधुनिकता के संपर्क से बचा हुआ, यह मटमैला, आर्द्र और उमसभरा गांव लगभग हमेशा ही उनींदा लगता है। पर अप्रैल-मई के दौरान कुछ दिनों के लिए यह गांव असामान्य रूप से जीवन से प्रफुल्लित हो उठता है। इसके मटमैलेपन का स्थान हुलसते रंग ले लेते हैं और चुप्पी की जगह उत्सव के स्वर ले लेते हैं। यह कुवागम के लिए त्यौहार का समय है और साल में पहली और अंतिम बार बाकी विश्व उसे देखता है।

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फ्रीडम फाउंडेशन - एक केस स्टडी
नई दिल्ली, 1 जनवरी 2002

1990 के दशक में आरंभ में बंगलौर के डि-पडिक्शन केंद्र में काम करते हुए दो मनोचिकित्सकों, अशोक के. राजू और कार्ल स्क्वेरा को यह देख कर भयपूर्ण विस्मय हुआ इस केंद्र में इलाज के लिए आने वाले नशे के लती लोगों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाता है। डि-एडिक्शन की प्रक्रिया में हिंसा का एक उपाय के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था। दोनों ने इस बेतुके दृष्टिकोण को बदलने की कोशिश की पर सफल न हो पाये। पर उनमें जरूरतमंद लोगों की सहायता करने के अपने उत्साह के परिणामस्वरूप उन्होंने 1992 में बंगलौर में फ्रीडम फाउंडेशन नामक डि-एडिक्शन उपचार केंद्र की स्थापना की।

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प्रोजेक्ट एसीई - शिक्षा के माध्यम से एड्स नियंत्रण (केस स्टडी)
1 जनवरी 2002

विश्व भर में युवा लोगों को एचआईवी/एड्स का जोखिम है। उनके मामले में रोकथामकारी रणनीतिक कार्य तभी सर्वाधिक प्रभावकारी होते हैं जब वे जोखिमपूर्ण व्यवहार आरंभ करने से पहले ही संक्रमण की रोकथाम के लिए आवश्यक कौशल सीख लें। एईसी परियोजना एक एचआईवी रोकथाम परियोजना है जो हमजोली शिक्षा का एक रणनीति के रूप में उपयोग करती है।

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पीपल प्ल्स - एक फोटो दस्तावेज
1 सितंबर 2001

इस पुस्तक का प्रकाशन अनेक रूपों में एक महत्वपूर्ण घटना है। सबसे पहले तो इसलिए कि यह भारत में एचआईवी/एड्स की वास्तविकताओं को अधिक स्पष्ट रूप से उजागर करती है। दूसरे, यह एचआईवी/एड्स के साथ जीने वालों के अनुभवों को सकारात्मक रूप से प्रस्तुत करती है, तीसरे यह इस बात पर बल देती है कि अगर महामारी के हमारे संयुक्त प्रत्युत्तर को प्रासंगिक, सार्थक और टिकाऊ बनाता है तो एचआईवी/एड्स के साथ जीने वाले लोगों की अधिक भागीदारी नितांत आवश्यक है।

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भारत में विभिन्न उप-आबादियों के बीच सघन हस्तक्षेपों की लागत
दक्षिण एशिया की एक केस स्टडी
1 जनवरी 2001

इस समय भारत में एचआईवी-व्याप्ति अपेक्षाकृत निम्न है, हालांकि बढ़ रही है। एचआईवी/एड्स की रोकथाम की रणनीतिया को लगातार परिष्कृत बनाने और महामारी के अनुरूप ढालने की जरूरत है। हमजोली शिक्षा, कण्डोम कार्यक्रमन, एसटीडी देखरेख और एचआईवी क उच्च जोखिम में पड़ी आबादियों के लिए अनुकूल वातावरण बनाने सहित व्यवहार परिवर्तन संचार के लिए किये जाने वाले सघन हस्तक्षेप आम तौर पर बहुत ही लगत-प्रभावी हस्तक्षेप होते हैं।

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भारत में एचआईवी/एड्स को समन्वित प्रत्युत्तर
1 जनवरी 2001

भारत में एचआईवी को समन्वित प्रत्युत्तर ने मंत्रालयों के भीतर एचआईवी का मुख्यधाराकरण करने, और अपने-अपने क्षेत्रों के भीतर उपयुक्त एचआईवी-प्रत्युत्तर विकसित करने हेतु उनकी क्षमताओं को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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परिवहन क्षेत्र में एक एसटीडी/एचआईवी हस्तक्षेप - एक केस स्टडी अपोलो टायर स्वास्थ्य देखरेख केंद्र
1 जनवरी 2001

भारत में विभिन्न शहरों के बीच चलने वाले ट्रकों में काम करने वालों की संख्या अनुमानत:4.5-5 मिलियन के बीच है और इनमें से अधिकतर 25-50 वर्ष आयु समूह के हैं। अपनी घुमंतू जीवन शैली और लगातार रोजगार-असुरक्षा के चलते उन्हें अनेक प्रकार के व्यावसायिक जोखिमों की विशेष रूप से संभावना होती है, जैसे कि रोजगार अनिश्चित स्थितियां, समय पर कार्य को पूरा करने की कठोर शतर्, सड़क दुघर्टनाएं, विभिन्न समूहों द्वारा, विशेषकर परिवहन और चुंगी विभाग द्वारा उत्पीड़न आदि। इसके अलावा, अपनी घुमंतू जीवन स्थिति, आराम न मिल पाने और अकेलेपन की वजह से उन्हें बहुत से भावनात्मक तनावों और स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन जोखिमों से बचने के लिए उनमें से अधिक शराब और नशीली दवाओं का सहारा लेने हैं और अपनी मात्रा के दौरान असुरक्षित यौन संपर्क में संलग्न होते हैं।

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मानव अधिकार और एचआईवी/एड्स पर राष्ट्रीय सम्मेलन
नई दिल्ली, 24-25 नवम्बर 2000

मानव अधिकार और एचआईवी/एड्स पर पहले राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन नई दिल्ली में 24-25 नवम्बर 2000 को किया गया। सम्मेलन का उद्देश्य मानव अधिकारों और एचआईवी/एड्स की रोकथाम एवं प्रबंधन के बीच संपर्क पर संबंधित संगठनों और समूहों के बीच संवाद आरंभ करना था।

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