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एशिया एड्स आयोग की रिपोर्ट के विमोचन के अवसर पर प्रधानमंत्री की टिप्पणियां

एशिया एड्स आयोग की रिपोर्ट के विमोचन के अवसर पर प्रधानमंत्री की टिप्पणियां

30 जून, 2008, नई दिल्ली

एशिया एड्स आयोग की रिपोर्ट का विमोचन करते हुए मुझे सचमुच अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। मैं अपने मित्र डॉ. सी. रंगराजन और आयोग के उनके सहकर्मियों को यह अत्यंत महत्वपूर्ण रिपोर्ट तैयार करने के लिए बधाई देता हूं। यह भली भांति अनुशोधित दस्तावेज है। यह ऐसी जानकारी और विश्लेषण को प्रस्तुत करता है जो एशिया के देशों में एचआईवी/एड्स की महामारी को कम करने की रणनीतियां तैयार करने में हमारी मदद कर सकता है।

यह जानकर प्रसन्नता होती है कि यह रिपोर्ट भारत में अपनाए गए बुनियादी रणनीतिक ढांचे को मान्यता प्रदान करती है। यह एचआईवी/एड्स की महामारी की हमारी समझ की पुन: पुष्टि करती है। यह दर्शाती है कि भारत में इस महामारी को रोकने के लिए हमने जो भी कदम उठाये हैं उनका मजबूत आधार रहा है।

इस रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से टिकाऊ उपलब्धियां हासिल करने के लिए इस समस्या के प्रति सार्वजनिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण के महत्व को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है। सार्वजनिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण ऐसी रणनीतियों पर बल देता है जो आबादी के असुरक्षित समूहों पर ध्यान केंद्रित करती हैं और रोग-संचरण को रोकने के उद्देश्य से समस्या की जड़ तक जाती हैं।

यह कुछ संतोष की बात है कि भारत में स्थिति उतनी चिंताजनक नहीं है जितनी कुछ वर्ष पहले बताई जाती थी। पहले जहां यह दावा किया जाता था कि भारत में 50 लाख लोग एचआईवी से संक्रमित हैं, वहां हाल के आकलन यह सुझाते हैं कि ऐसे लोगों की संख्या 20 से 30 लाख तक है जो कि मुख्यत: आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में रहते हैं।

एचआईवी/एड्स की महामारी की वजह से अनेक सामाजिक पूर्वाग्रह भी सामने आए हैं। अधिकतर मामलों में इसका कारण यौन मार्ग द्वारा संचरण है। इससे निबटने की रणनीतियों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत स्वच्छता के प्रश्न को लेकर अधिक समावेशकारी और कम "मूल्यांकनकारी" (जजमेंटल) रणनीतियां अपनानी होंगी।

इसकी शुरूआत एड्स के रोगियों के प्रति लांछन या कलंक के मुद्दे को हल करके की जानी चाहिए। मेरा मानना है कि एचआईवी/एड्स के बारे में बढ़ती जागरूकता हम पर इन मुद्दों को हल करने के लिए दबाव डाल रही है।

सरकार को इसमें नेतृत्वकारी भूमिका निभानी चाहिए। हमें उन विधायी या कानूनी बाधाओं को दूर करने के लिए काम करना चाहिए जो सेवाओं तक उच्च जोखिम समूहों की पहुंच को बाधित करती हैं। एक ऐसा कानून बनाने का प्रस्ताव भी है जो रोजगार, संपत्ति अथवा सेवाएं प्राप्त करने में एड्स के रोगियों के प्रति भेदभाव करने वालों को दण्डित करेगा। इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

चाहे यौनकर्मी हों या समलैंगिक या नशीली दवा लेने वाले, ऐसे अनेक असुरक्षित सामाजिक समूहों को काफी सामाजिक पूर्वाग्रह झेलने पड़ते हैं। इससे एड्स रोगियों की पहचान और उपचार का काम काफी कठिन हो जाता है।

अगर एचआईवी/एड्स के विरुद्ध इस लड़ाई को जीतना है तो हमें एक अधिक धैर्यपूर्ण सामाजिक वातावरण का निर्माण करना होगा। समस्या के संबंध में अधिक धैर्यपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने के लिए जरूरी नहीं कि सामाजिक रूप से अस्वीकार्य या चिकित्सीय दृष्टि से अनुचित यौन तौर-तरीकों की अनदेखी की जाये। यह पूरे समाज के हित में है कि एड्स से पीड़ित हर व्यक्ति इसके खिलाफ लड़ाई को जीते। वे गरिमापूर्ण जीवन के अधिकारी हैं और यह उनका अधिकार है।

असुरक्षित आबादी के समूहों को लक्ष्य बनाते हुए हाथ में ली गई लक्ष्यबद्ध हस्तक्षेप परियोजनाएं उपयोगी और आवश्यक हैं। इसके साथ अधिक व्यापक आधार वाले शिक्षा कार्यक्रम चलाये जाने चाहिए। उपयुक्त विद्यालय-चरणों में आधुनिक यौन शिक्षा काफी महत्वपूर्ण है।

रिपोर्ट में एचआईवी और एड्स के संबंध में राष्ट्रीय प्रत्युत्तर के एक अंग के रूप में राजनीतिक भागीदारी और नेतृत्व के महत्व को उजागर किया गया है। उनकी मदद से ही कण्डोम के उपयोग सहित स्वस्थ यौन तौर-तरीकों के बारे में जन-जागरूकता फैलाई जा सकती है और सामाजिक पूर्वाग्रह को समाप्त किया जा सकता है।

हमें उन असुरक्षाओं को समझने की जरूरत है जो कुछ लोगों को जोखिमपूर्ण व्यवहार अपनाने को विवश करती है; और साथ ही उन्हें प्रासंगिक जानकारी और बुनियादी सेवाएं प्रदान करने की जरूरत भी है। हमें उन्हें पूर्ण जागरूकता और उत्तरदायित्व के साथ खुद अपने विकल्प चुनने हेतु समुचित सहायता प्रदान करनी होगी। यौन विकल्पों से संबंधित मामलों में अपने मानसिक अवरोधों को त्यागते हुए हमें व्यवहार परिवर्तन को प्रोत्साहित करना होगा और सामाजिक आचार-व्यवहार को रूपायित करना होगा।

हमारी सरकार राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन की रणनीतियों और कार्य को सहायता देने के प्रति पूरी तरह से वचनबद्ध है। यह देख कर प्रसन्नता होती है कि पिछले दो वर्षों में रोकथाम और उपचार के बीच संतुलन बनाते हुए, सेवाओं की सुलभता को बढ़ाने के लिए कदम उठाये गये हैं। मैं इस कठिन समस्या से निबटने और इस रोग को नियंत्रित करने में नेतृत्व दर्शाने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और नाको को बधाई देता हूं।

मैं देश भर के समस्त चिकित्सकों, अस्पतालों और रक्त बैंकों से आग्रह करता हूं कि वे रक्त संग्रहण और रक्त चढ़ाने के मामले में शून्य जोखिम और सर्वोत्तम तौर-तरीकों वाली पद्धतियां अपनाएं। हर नागरिक को रक्त सुरक्षा के हमारे तौर-तरीकों पर पूर्ण विश्वास होना चाहिए। इसलिए मुझे खुशी है कि एक राष्ट्रीय रक्त आधान प्राधिकरण स्थापित करने के लिए पहल की गई है।

एचआईवी/एड्स और 'सार्स' और एवियन फ्लू जैसी महामारियों की समस्या स्पष्ट रूप में इस प्राचीन भारतीय कहावत में निहित समझदारी को दर्शाती है: "वसुधैव कुटुंबकम" (अर्थात् पूरा विश्व एक परिवार है)। प्रकृति की अन्य परिघटनाओं की तरह, रोग राष्ट्रीय सीमाओं को नहीं मानते। इसलिए महामारियों के प्रति सामाजिक प्रत्युत्तर केवल राष्ट्रीय प्रत्युत्तर तक सीमित नहीं रह सकता।

बेशक, हर देश और हर सरकार के पास मानव सुरक्षा एवं स्वास्थ्य पर मंडराते ऐसे खतरों से निबटने के लिए एक रणनीति होनी चाहिए। हमें राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर रोकथामकारी और उपचारी रणनीतियों की जरूरत है। किंतु ऐसे राष्ट्रीय प्रयास अधिक व्यापक क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रयास का अंग होने चाहिए। अत: मुझे यह देखकर प्रसन्नता हो रही है कि मेरे मित्र डॉ. रंगराजन ने इस आयोग की - जो एशिया स्तर पर समस्या को व्यापकतर रूप में देखता है - अध्यक्षता की।

हम एक अधिकाधिक रूप से एकीकृत दुनिया में रह रहे हैं। मानवता के सामने ऐसी कुछ ही समस्याएं हैं जिन्हें सरकारें अपनी राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर असरकारी ढंग से हल कर सकती हैं। पर समस्या चाहे महामारियों की हो, खाद्य सुरक्षा की हो, बढ़ती ऊर्जा कीमतों की हो, जल के अभाव और उपयोग की हो, मौसम बदलाव और भूमंडलीय तापन की हो, समस्या चाहे आतंकवाद की हो, नशीली दवाओं के व्यापार और हथियारों के प्रसार की हो, या फिर जन संहार के हथियारों के फैलाव के खतरे से जुड़ी हो - इन सभी के लिए भूमंडलीय स्तर पर प्रभावकारी सहयोगपूर्ण कार्रवाई जरूरी है।

हमारे सामने मौजूद हर चुनौती के अंतर्राष्ट्रीय आयाम और अंतर्राष्ट्रीय निहितार्थ हैं। वह दुनिया अब नहीं रह गई जिसमें राष्ट्रीय सरकारों को अपने सामने उपस्थित चुनौतियों से अपने बूते पर निबटना होता था। हम भूमंडलीय अंतर्निभरता के युग में रह रहे हैं।

मैं इस तथ्य से प्रोत्साहित हुआ कि एचआईवी/एड्स का भूमंडलीय प्रत्युत्तर रचनात्मक रहा और इसके सकारात्मक परिणाम सामने आये। मुझे आशा है कि यह हमें इसी तरह की दूसरी चुनौतियों से निबटने में आगे का रास्ता दिखायेगा। मैं आशा करता हूं कि यह रिपोर्ट इस विषय पर उपलब्ध ज्ञान में योगदान करेगी और देश के भीतर अधिक प्रभावकारी प्रत्युत्तर को तैयार करने में हमारी मदद करेगी। मैं इस रिपोर्ट के लेखकों को बधाई देता हूं।

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