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एड्स और कानून पर न्यायिक सम्मेलन

एड्स और कानून पर न्यायिक सम्मेलन

यूएनएड्स और ह्यूमन लीगल राइट्स नेटवर्क ने 19-20 मई 2007 को नई दिल्ली में 'एड्स और कानून' विषय पर संयुक्त रूप से एक सम्मेलन का आयोजन किया। सम्मेलन में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अल्तमास कबीर सहित सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के अग्रणी न्यायाधीशों ने भाग लिया। सम्मेलन में 60 से अधिक सहभागी उपस्थित थे जिनमें दक्षिण अफ्रीका के संवैधानिक न्यायालय के न्यायमूर्ति याकूब शामिला।

न्यायपालिका को भारत में एचआईवी/एड्स के फैलाव से संबंधित मुद्दों से अवगत कराने के उद्देश्य से आयोजित इस सम्मेलन में निम्नलिखित मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया गया-

  • उच्च जोखिम वाले समूहों के सामने उपस्थित मुद्दे जिनमें उनके कानूनी मुद्दे भी शामिल थे;
  • एचआईवी/एड्स के साथ जीने वाले सामान्य आबादी के सदस्यों के सामने उपस्थित मुद्दे जिनमें उनके कानूनी मुद्दे भी शामिल थे;
  • वे कानूनी प्रावधान जिनके अंतर्गत एचआईवी/एड्स के साथ जीने वाले लोगों को वर्तमान में अधिकार दिलाए जा सकते हैं;
  • एक ऐसे कानून की जरूरत जो विशेष रूप से एचआईवी/एड्स के साथ जीने वाले लोगों के अधिकारों से संबंधित हो; और
  • अंतर्राष्ट्रीय और भारत-विशिष्ट सामान्य कानून में एचआईवी/एड्स के साथ जीने वाले लोगों को अधिकार दिलाने से संबंधित पूर्व उदाहरण।

न्यायमूर्ति कबीर के नेतृत्व में सहभागियों ने एक ऐसे कानून की जरूरत पर बल दिया जो कानूनी प्रणाली की विशेषकर एचआईवी/एड्स से जुड़े मुद्दों को हल करने में मदद करें। न्यायमूर्ति कबीर के अनुसार ''भारतीय संविधान की धारा 21, 14, 16 और 19 हमें एचआईवी/एड्स के साथ जीने वाले लोगों के मानव अधिकारों को प्रवर्तित करने की इजाजत देती हैं... पर हमें इससे परे जा कर एक ऐसे कानून की जरूरत है जो विशेषत: इन अधिकारों से संबंधित हो।''

सम्मेलन में इस बात पर बल दिया गया कि जहां एचआईवी/एड्स से विशेष रूप से असुरक्षित लोगों को उनके अधिकारों से वंचित किया जाता है, वहां कानून की समीक्षा की जानी चाहिए। ये विशेष रूप से असुरक्षित समूह हैं - यौनकर्मी, नशीली दवा की सुई लगाने वाले, पुरुषों के साथ यौन संपर्क करने वाले पुरुष, प्रवासी मजदूर और महिलाएं। असुरक्षित समूहों से जुड़े कानूनी मुद्दे इस प्रकार हैं:

  • अनैतिक देह व्यापार रोकथाम कानून (आईटीपीए) में वेश्या की परिभाषा के अंतर्गत यौनकर्मी को अपराधी माना गया है; यौनकर्मी के ग्राहक को भी अपराधी मानने हेतु एक प्रस्तावित संशोधन है। इससे होगा यह कि यह उच्च जोखिम वाला समूह भूमिगत हो जाएगा तथा इस तरह यौनकर्मियों के लिए रोकथामकारी और उपचार सेवाएं प्राप्त करना कठिन होगा।
  • नार्कोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रापिक सब्सटांसेज (एनडीपीएस) कानून नशीली दवा का उपयोग करने वाले और नशीले पदार्थों की तस्करी करने वाले को समान माना गया है; नशीले पदार्थों के तस्कर की आपराधिकता और नशीली दवा लेने वाले की असुरक्षा को समकक्ष रखा गया है। इस तरह यह कानून नशीली दवा लेने वाले को पुनर्वास और नुकसान में कमी लाने वाली सेवाएं; से और साथ एचआईवी की रोकथाम और उपचार सेवाएं प्राप्त करने से रोकता है।
  • भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के अनुभाग 377 में यह अनुबंध है कि समलैंगिक व्यवहार अपराध है।

सहभागियों ने यह सुझाया कि इस तरह की सीमांतक आबादी को अपराधी मानने वाले कानूनों की समीक्षा की जानी चाहिए। इसके अलावा, उनका कहना था कि विवाह के अंतर्गत बलात्कार को मान्यता देकर विवाह संबंधों में अपनी बात मनवाने की महिलाओं की वर्तमान में जो निम्न क्षमता है उसे मजबूत बनाने के लिए कानून बनाय जाना चाहिए। यह सुझाव भी दिया गया कि यदि बच्चों के साथ यौन व्याभिचारपर अलग से कोई कानून बने तो बच्चों के अधिकारों को भी मजबूत बनाया जा सकता है।

सहभागी न्यायाधीशों ने विचार-विमर्श हेतु अनेक मुद्दे उठाए जिनमें निम्नलिखित बातों से जुड़े प्रश्न शामिल थे -

  • असुरक्षित और उच्च जोखिम वाले समूहों के प्रति दृष्टिकोण में नैतिकता की भूमिका;
  • एचआईवी/एड्स के साथ जीने वाले लोगों को उनके अधिकार दिलाने में न्यायाधीशों की भूमिका;
  • यौन शिक्षा के संदर्भ में सूचना अधिकार से संबंधित कानून;
  • भारत में एचआईवी/एड्स के मुद्दों को विशेष रूप से हल करने वाले कानून की जरूरत;
  • विशेषकर नियोक्ताओं और संभावित नियोक्ताओं द्वारा आवश्यक एचआईवी जांच से जुड़े मुद्दे;
  • उन लोगों के, जो एचआईवी से संक्रमित नहीं हैं, अधिकार बनाम एचआईवी से संक्रमित लोगों के अधिकार;
  • ऐसे पेटेंट कानून जो दवाओं की कीमतों के माध्यम से उपचार प्राप्त करने में बाधा डाल सकते हैं।
  • एचआईवी/एड्स के नियंत्रण और साथ ही इस महामारी के फैलाव से जुड़े जमीनी स्तर के मुद्दे।

सहभागियों ने यह कह कर यौन शिक्षा का मुद्दा भी उठाया कि जहां एक ओर यह शिक्षा संस्थाओं और नीति निर्माताओं का मुद्दा है, वहां नागरिक समाज मामले को न्यायालय के सामने ला सकता है और न्यायपालिका से फैसला देने को कह सकता है।

सहभागियों ने कहा कि एचआईवी की रोकथाम और उपचार के संदर्भ में अनेक कानूनी मुद्दे उभर कर आते हैं, जैसे कि क्षतिपूर्ति, गोपनीयता, अलगाव, भेदभाव आदि के मुद्दे। कुछ सहभागियों ने यह भी कहा कि एड्स और एचआईवी की रोकथाम एवं उपचार के संदर्भ में लोगों के अधिकारों के बारे में न्यायिक फैसलों के माध्यम से जागरूकता पैदा की जा सकती है।

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