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भारत में एचआईवी महामारी
  एचआईवी सेंटिनल निगरानी और एचआईवी आकलन 2006 
  वार्षिक एचआईवी सेंटिनेल निगरानी देश रिपोर्ट 2006 
  एचआईवी तथ्य-तालिका 
  2007 एड्स महामारी के ताजा आंकड़े 

मानचित्र

- 1986
- 1990
- 1998
- 2002
एसटीडी क्लीनिकों में उपस्थित होने वाले रोगियों में एचआईवी की जिला-वार व्याप्ति (2004)
एएनसी क्लीनिकों में उपस्थित होने वाले रोगियों में एचआईवी की जिला-वार व्याप्ति (2004)
दिल्ली, पश्चिम बंगाल और मुंबई (1998-2003)
उच्च व्याप्ति वाले राज्य (1998-2003)
न्यून व्याप्ति वाले कुछेक राज्य (1998-2003)
एड्स के मामले (1986-2004)
नैको : एचआईवी संक्रमण के अनुमान एचआईवी संक्रिय निगरानी 2003
भारत में एचआईवी अनुमान (1981-2004)

भारत में एचआईवी की महामारी

एचआईवी अधिक सटीक और नये आकलन यह इंगित करते हैं कि 2006 में भारत में 25 लाख (20 लाख से 31 लाख के बीच) लोग एचआईवी के साथ रह रहे थे और राष्ट्रीय वयस्क एचआईवी व्याप्ति दर 0.36 प्रतिशत थी। हालांकि एचआईवी के साथ जीने वालों का यह अनुपात, पिछले आकलनों से कम है, पर भारत में यह बीमारी काफी बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित करना जारी रखे हैं।

संशोधित आकलन विस्तरित और उन्नत निगरानी प्रणाली तथा अधिक ठोस और विस्तृत पध्दति के उपयोग पर आधारित है। आकलन प्रक्रिया में हाल के राष्ट्रीय परिवार सर्वेक्षण (राष्ट्रीय परिवार सर्वेक्षण - 3) को शामिल करने से संशोधित आकलनों में महत्वपूर्ण योगदान हुआ। सर्वेक्षण के अंतर्गत 1,00,000 लोगों की एचआईवी जांच की गई। यह एचआईवी के घटक को शामिल करने वाला पहला राष्ट्रीय जनसंख्या - आधारित सर्वेक्षण था (एनएफएएचएस - 3, 2007)।

इसके अतिरिक्त, हाल के वर्षों में भारत में अपनी सेंटिनेल निगरानी प्रणाली का विस्तार किया है और निगरानी स्थलों की संख्या को 1998 के 155 से बढ़ा कर 2006 में 1120 कर दिया गया। इस निगरानी में प्रसव पूर्व जांच कराने वाली गर्भवती महिलाओं, यौन संचरित रोगों की जांच कराने वाले लोगों और आबादी समूहों से प्राप्त आंकड़े शामिल किये गये।

भारत में व्याप्ति संबंधी आंकड़े अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में अलग-अलग है। उन चार दक्षिणी राज्यों (आंध्र प्रदशे, कर्नाटक, महाराष्ट्र और तमिलनाडु) - जहां अधिकांश एचआईवी-संक्रमित लोग रहते हैं - एचआईवी की व्याप्ति कुछ जिलों में संकेंद्रित है (नैको 2005 क; विश्व बैंक 2005)। हाल के राष्ट्रीय जनसंख्या-आधारित सर्वेक्षण में शामिल छह राज्यों में सूचित वयस्क एचआईवी व्याप्ति भी काफी अलग-अलग है - उत्तार प्रदेश में 0.07 प्रतिशत और तमिलनाडु में 34 प्रतिशत; महाराष्ट्र में 0.62 प्रतिशत; कर्नाटक में 0.69 प्रतिशत; आंध्र प्रदेश में 0.97 प्रतिशत और मणिपुर में 1.13 प्रतिशत।

अन्य सभी राज्यों में कुल व्याप्ति 0.13 प्रतिशत हैं। सेंटिनेल निगरानी आंकड़ों के पूर्व में किये गये एक विश्लेषण से यह पता चलता है कि कुछ मिलकर दक्षिणी राज्यों में एचआईवी व्याप्ति उत्तारी राज्यों से पांच गुना थी। किंतु उच्च एचआईवी व्याप्ति के केंद्र मुख्यत: एचआईवी के उच्च जोखिम वाले आबादी समूहों के बीच उन राज्यों में भी चिन्हित किये गये हैं जहां कुल व्याप्ति निम्न स्तर पर है।

वर्ष 2006 की विस्तारित सेंटिनेल निगरानी से प्राप्त आंकड़े तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में गर्भवती महिलाओं के बीच व्याप्ति के स्थिर रहने या उसमें गिरावट आने के रूझान को दर्शाते हैं, पर ये यह भी दर्शाते हैं कि कुछ राज्यों में यौनकर्मियों के बीच एचआईवी व्याप्ति उच्च है तथा नशीली दवा की सुई लगाने वालों और पुरुषों के साथयौन संपर्क करने वाले पुरुषों के बीच यह बढ़ रही है। यदि देश के पूर्वोत्तारी क्षेत्र - जहां नशीली दवा की संदूषित सुई लगाना ही जाखिम का मुख्य कारक है - को छोड़ दें तो ऐसा लगता है कि एचआईवी मुख्यत: यौनकर्मियों और उनके ग्राहकों और उनके अन्य यौन साझेदारों के बीच असुरक्षित यौन संपर्क के कारण फैल रहा है (कुमार और अन्य, 2005)। यौनकर्मियों पर ध्यान केंद्रित करते हुए चलाये जाने वाले रोकथाम कार्यक्रम एचआईवी व्याप्ति की दृष्टि से कुछ सुधार दर्शाते हैं; और जहां लक्ष्यबध्द रोकथामकारी प्रयास किये गये हैं वहां, और विशेषकर तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों में यौनकर्मियों के बीच एचआईवी की व्याप्ति में गिरावट देखने में आई है। किंतु व्यावसायिक यौनकर्म की विविधितापूर्ण प्रकृति की वजह से रोकथाम के प्रयासों में अक्सर जटिलता आती है (चार, पिलर और शिरके, 2003)

 

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