विश्व एड्स दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का नई दिल्ली में संसद के दोनों सदनों के सदस्यों को अभिभाषण का पाठ

एचआईवी मुक्त भारत: एक मिशन
विश्व एड्स दिवस के अवसर पर माननीय संसद सदस्यों के बीच उपस्थित होते हुए मैं यह महसूस करता हूं कि हमारे देश के लिए महत्वपूर्ण स्वास्थ्य मिशन को हृदय रोगों और केसर के अलावा टीबी, अतिसार जैसे जल संक्रामक रोगों मलेरिया जैसे रोगवाहक रोगों के साथ लड़ना है। तथापि, पिछले कुछ वर्षों से एचआईवी/एड्स एक मूक हत्यारे का रूप धारण कर रहा है क्योंकि संक्रमण से लेकर घातक रोग संलक्षणों की पहचान करने में दस वर्ष का समय लग जाता है।
आज की तारीख में दो स्थितियों, जिनके बारे में मैं आपसे चर्चा करने जा रहा हूं से संबंधित अनुभवों को लेकर एचआईवी/एड्स संबंधी विचारों में हम सभी के लिए इस आशय के महत्वपूर्ण संदेश निहित हैं कि एचआईवी प्रभावित व्यक्ति वास्तविक जीवन में जिन समस्याओं को झेल रहे हैं उस तरह की समस्याओं के साथ कैसे निपटा जाए। मैं आपके साथ ‘एचआईवी मुक्त भारत: एक मिशन’ विषय पर बातचीत करना चाहूंगा।
बेन्सन और बेन्सी की कहानी
सर्वप्रथम मैं 2003 में कोची की अपनी यात्रा के दौरान हुई एक घटना की चर्चा करूंगा। वहां स्वास्थ्य विभाग, केरल के सचिव ने मुझसे एचआईवी से प्रभावित बेन्सन और बेन्सी नामक एक लड़के और लड़की से मेरा परिचय कराया, ये दोनों बच्चे अपने दादा के साथ आए हुए थे। मैंने तत्काल उन बच्चों के साथ बातचीत करनी शुरू कर दी और उनका अभिवादन किया। दोनों बच्चे हंसमुख थे। तब मुझे यह बताया गया कि ये दोनों बच्चे कोलम के निकट एक स्कूल में पढ़ रहे थे और जैसे ही स्कूल अधिकारियों को उनकी रोग की किस्म के बारे में पता चला, बच्चों को स्कूल से बाहर निकाल दिया गया। केरल में मीडिया के लिए यह एक बड़ी खबर थी। बच्चों के अभिभावकों के दबाव के कारण दाखिले से मना किया गया क्योंकि वे यह नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे एचआईवी प्रभावित बच्चों के साथ रहें। तब स्वास्थ्य विभाग के सचिव ने राष्ट्रपति भवन में मेरे साथ मुलाकात की और मुझे समस्याओं के बारे में संक्षेप बताया। चर्चा के दौरान हमने यह महसूस किया कि एचआईवी के संबंध में जिस प्रकार की शिक्षा और संचार का हम प्रचार करना चाहते हैं, वह अभिभावकों, स्कूल अधयापकों और अनेक सहायता समूहों तक नहीं पहुंच पा रहा है। हमने यह निर्णय लिया कि मीडिया के जरिए लोगों को एचआईवी की बाबत शिक्षित करना और सबसे बढ़कर यहां तक कि विभिन्न बस्तियों में धार्मिक प्रमुखों को इकट्ठा करना बहुत ही महत्वूपर्ण है जोकि इस आशय का संदेश प्रसारित कर सकें कि एचआईवी रोगियों का स्पर्श करने अथवा उनके साथ भोजन करने अथवा उन्हें काटने वाले मच्छरों से तब तक संक्रमण नहीं होता जब तक कि रुधिर के माधयम से विषाणु संचरित न हो जाएं। संदेश का प्रसार करने वाले अभियान को कार्यरूप दिया गया और बाद में केरल सरकार ने केरल में छात्रों, अधयापकों तथा शैक्षिक संस्थानों के अन्य स्टाफ के लिए एचआईवी/एड्स पर एक नीति प्रकाशित की। स्कूलों में अनेक अभिभावकों ने जिन्होंने पूर्व में अपने स्कूलों में एचआईवी प्रभावित बच्चों के पढ़ने का विरोध किया था अब यह महसूस कर लिया है कि रोग को लेकर उनकी भ्रांतियां थी और अब उन्हें ऐसे बच्चों के स्कूल में पढ़ने को लेकर कोई आपत्ति नहीं है। एक निगमित कार्यालय के उदार दान तथा जिला प्रशासन की सक्रिय सहायता से इन बच्चों को अब त्रिवेन्द्रम मेडीकल कालेज में नियमित जांच के साथ-साथ विशेष ऐण्टीरिट्रोवाइरल उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है। हालांकि सफलता की यह अकेली कहानी नहीं हो सकती, फिर भी मैं ऐसा महसूस करता हूं कि भेदभाव के कई अन्य मामले मौजूद हो सकते हैं। यही वह बिन्दु है जहां जन नेताओं, विशेष रूप से संसद सदस्यों की भूमिका बहुत महत्वूपर्ण हो जाती है। इकट्ठे होकर बैठना और एक ऐसा कानून पारित करना संसद सदस्यों का काम है जोकि एड्स के रोगियों के रोजमर्रा के जीवन में उनके प्रति भेदभाव की रोकथाम करेगा। विधान के एक ऐसे प्रारूप पर स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय काम कर रहा है और मैं माननीय सदस्यों से आग्रह करूंगा कि वे यह सुनिश्चित करें कि अगले छ: महीने के भीतर एक मजबूत और प्रभावी विधान लागू किया जाए।
इस बीच संसद सदस्य, स्थानीय प्रशासनों, पंचायत अधिकारियों तथा जिलों अथवा ब्लाकों में कार्यरत एनजीओ के साथ भेदभाव का मुद्दा उठा सकते हैं और एक ऐसे आंदोलन को जन्म दे सकते हैं जिससे कि प्रभावित लोगों को लांछन और भेदभाव से एक समयबध्द ढंग से पूरी तरह मुक्ति मिल सके।
सीआईआई नेतृत्व कन्क्लेव
जिस दूसरी घटना का मैं वर्णन करने जा रहा हूं वह बंगलौर में उस समय घटी थी जबकि मैं 20 अगस्त, 2005 को सीआईआई द्वारा आयोजित युवकों के लिए नेतृत्य कन्क्लेव को संबोधित कर रहा था। जबकि नेतृत्व के गुणों पर विस्तार से चर्चा चल रही थी तो मैंने सदस्यों को यह सुझाया कि बेसलाइन की शुरूआत प्रत्येक सहभागी के इस आशय के मिशन के आधार पर होगी कि 'मुझे किसलिए याद किया जाएगा।'
एक सहभागी का उत्तर
श्रीमती आशा रमैय्या ने जोकि सम्प्रति एचआईवी/एड्स से पीड़ित व्यक्तियों के नेटवर्क के लिए राष्ट्रीय पक्षपोषण अधिकारी के रूप काम कर रही है और जो स्वयं 1995 से एक एचआईवी/एड्स रोगी है, यह कहा कि, ''मेरे जीवन में सच्ची शिक्षा तब शुरू हुई जब मुझे मेरे जीवन की सच्चाई का सामना करना पड़ा। सबसे पहले तो मेरे पति के परिवार ने मुझे घर से निकाल दिया और बाद में यहां तक कि मेरे अपने पिता ने मुझसे घर छोड़ने को कहा। मुझे अपनी रक्षा करनी थी और फिर खड़े होकर जिंदगी की चुनौतियों का सामना करना था। मैं इस आघात के एहसास को साहस के बल पर अपने भीतर समेट पाई थी।
आज एचआईवी से ग्रस्त अपने साथियों से प्राप्त हुई सहायता के सहारे मैं अपने परिवार तथा समुदाय में अपना ली गई हूं। मेरे माता-पिता को इस बात पर गर्व है कि मैं दूसरों के अनुकरण के लिए एक भूमिका प्रतिरूप बन गई हूं। परिवार के एक अश्वस्त और साथियों के भारी समर्थन के बल पर मैंने वर्ष 2000 में एचआईवी पीड़ित एक अन्य व्यक्ति के साथ विवाह कर लिया। यहां तक मैंने चिकित्सीय मार्गनिर्देशों का पालन करते हुए एक बच्चे को जन्म देने का भी निर्णय ले लिया ताकि जोखिम कम रखा जा सके। वर्षों के इन्तजार के बाद जब इस बात की पुष्टि हो गई कि हमारे बच्चे को कोई संक्रमण नहीं है तो हम सफल हो गए। हमने यह सीखा कि सपने साकार होते हैं लेकिन केवल तभी जब आप उन्हें अपना लें और उनकी पूर्ति करने की दिशा में किसी भी संभावित जोखिम का दायित्व स्वीकार कर लें। अब मेरे ऊपर अपने बच्चे के भविष्य के लिए अगले बीस वर्षों की योजना बनाने की जिम्मेदारी आ गई है। ''मुझे इस बात की खुशी है कि आज की तारीख में एचआईवी/एड्स संक्रमित माता से बच्चे को संक्रमण रोकने के लिए दवाई भारतीय बाजार में बहुत ही कम मूल्य पर उपलब्ध है।''
श्रीमती आशा रमैय्या का यह कहना भी है कि, ''खड़े होने और जिंदगी का मुकाबला करने में मैने जिस साहस का परिचय दिया है और इस संघर्ष के दौरान ज्ञान का जो प्रकाश मुझे मिला है, उसे बांटने में मेरे प्रयासों के लिए मुझे देश के अनेक भागों में रह रहे एचआईवी/एड्स से ग्रस्त व्यक्तियों द्वारा मेरे परिवार, रिश्तेदारों और साथियों द्वारा याद किया जाएगा।''
मित्रों, श्रीमती आशा के अनुभव से हमें यह संदेश प्राप्त होता है कि मनुष्य होने के नाते हम समस्याओं में जकड़ सकते हैं लेकिन हमें हार नहीं माननी है। हमें समस्या को पराजित करने और सफल होने के रास्ते तलाश करने हैं। मेरा मानना है कि देश के विभिन्न भागों में ऐसे कई व्यक्ति होंगे जोकि चुपचाप यह सब सहन कर रहे होंगे। संसद सदस्य इस घटना से इस आशय का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश देख सकते हैं कि किस प्रकार एचआईवी से जुड़ा लांछन यहां तक कि निकट सदस्य भी अपने परिजनों को त्याग देते हैं। इसके साथ ही जुड़ा हुआ एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि एचआईवी से प्रभावित एक माता उचित चिकित्सीय मार्गदर्शन के माधयम से और देश के भीतर उपलब्ध औषधियों का प्रयोग करके किस प्रकार एचआईवी से मुक्त बच्चे को जन्म दे सकती है। एचआईवी से जुड़े लांछन को हटाने के लिए देश में जानकारी बराबर प्रसारित की जाती है और साथ ही रोग की विभिन्न अवस्थाओं में एचआईवी को नियंत्रित करने के लिए औषधियों की उपलब्धता में भी तेजी लाई जाने की जरूरत है। संसद सदस्य निश्चय ही पंचायतों और धार्मिक केन्द्रों के माधयम से अपने निर्वाचन क्षेत्र में लोगों को इस आशय की जानकारी दे सकते हैं।
एचआईवी/एड्स नियंत्रण
आज की तारीख में हमारे देश में सभी आयु-वर्गों को मिलाकर 5.7 मिलियन एचआईवी मामले हैं। देश में 611 में से 163 जिलों में एचआईवी मामलों का अनुपात उच्चतर है। वैज्ञानिक समुदाय के समक्ष एचआईवी की आनुवंशिक प्रकृति का निर्धारण करने का एक महत्वपूर्ण मिशन मौजूद था जिससे कि इस रोग का इलाज हो सके। अध्ययन करने के बाद इसकी आनुवंशिक प्रकृति को लेकर कुछ आश्चर्यजनक तथ्य उभर कर आएं। रीट्रो विषाणु डीएनए आधारित नहीं बल्कि आरएनए आधारित है। अधिकांश रीट्रो विषाणुओं में केवल तीन जीन होते हैं जबकि एचआईवी विषाणु में 9200 बेस युग्मों सहित 9 जीन होते हैं। आनुवंशिक प्रकृति की इस समझ के बाद कम से कम एचआईवी को, उसकी जो स्थिति है वहीं नियंत्रित करने के लिए अनेक दवाएं आ गई हैं। इस हस्तक्षेपणीय उपाय से एचआईवी प्रभावित व्यक्तियों का जीवनकाल बढ़ जाता है। विदेशों में तैयार और विकसित की गई विशिष्ट औषधि का नाम एजेडटी है जोकि डीएनए संश्लेषण्ा पर आधारित है। यह दवाई रोग के प्रसार को रोक देती है। इंडिनावीर नामक पाई गई एक अन्य दवाई के भी समान रूप से अच्छे परिणाम देखने में आए हैं। एक विदेशी विश्वविद्यालय ने कुछ रोगियों के लिए एजेडटी-इंडिनावीर तथा 3टीसी के मिश्रण का प्रयोग किया है जिसने एचआईवी/एड्स विषाणु को पूरी तरह दमित करके अद्भुत परिणाम प्रस्तुत किए हैं। निश्चय ही इस दिशा में अनुसंधान जारी है। इस विषय पर मैं आप लोगों के साथ इसलिए चर्चा कर रहा हूं कि आपको यह बताऊं कि एचआईवी को नियंत्रित करना और रोगियों के जीवनकाल बढ़ाना संभव है। लेकिन दवाई बहुत अधिक खर्चीली है। दवाइयों की लागत कम करनी होगी और इसे वहनीय बनाना होगा और सबसे बढ़कर यह कि जरूरतमंद रोगियों के लिए एक लागत में एक स्थायी राहत पर विचार किया जाना चाहिए।
एचआईवी-विरोधी टीके का निर्माण
इसलिए आज की तारीख में देश के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण मिशन एचआईवी नियंत्रण प्रोटोकाल के अलावा एचआईवी के और आगे प्रसार को रोकना है। एक कारगर एचआईवी विरोधी टीके का उत्पादन करने और उसमें नेतृत्व प्रदान करने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं है।
एक आयातित ऐडीनो-सम्बध्द विषाणु आधारित टीके के नैदानिक परीक्षण का पहला चरण राष्ट्रीय एड्स अनुसंधान संस्थान, पुणे में 2005 के आरम्भ में शुरू हुआ था। जिन तीस स्वयंसेवकों को अध्ययन में शामिल किया गया था और एचआईवी का टीका लगाया गया था उनके संबंध में अनुवर्ती कार्रवाई जनवरी, 2007 में पूरी होगी। स्वयंसेवकों ने इस टीके को अच्छी तरह सहन कर लिया है और सुरक्षा उत्तम है। अनुवर्ती कार्रवाई के दौरान इम्यूनोजेनेसिटी अध्ययन किए गए थे। अन्तिम स्वयंसेवक के संबंध में अनुवर्ती कार्रवाई के बाद परिणाम डीकोड और विश्लेषित किए जाएंगे। चरण A परीक्षणों की सफलतापूर्वक पूर्ति होने की स्थिति में किसी भारतीय कम्पनी को प्रौद्योगिकी का अन्तरण किया जाएगा। भारतीय एचआईवी-। उपकोटि सी विषाणु जीन से तैयार किए गए एक अन्य माडीफाइड वैक्सिनिया अन्कारा (एमवीए) आधारित टीके का एक अन्य चरण । टीका परीक्षण पिछलेे वर्ष टयूबरक्यूलोसिस रिसर्च सेंटर में शुरू किया गया था। यह टीका आईसीएमआर-नाको-लावी कार्यक्रम के अधीन भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा एक अमरीकी कम्पनी के सहयोग से तैयार किया गया है। ये दो एचआईवी-विरोधी टीके एक समयबध्द मिशन पध्दति से पूर किए जाने हैं क्योंकि भारत के एचआईवी नियंत्रण कार्यक्रम के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है। इसके अलावा परम्परागत चिकित्सा आधारित टीकों सहित भारतीय आर तथा डी संस्थानों के बीच सहयोगात्मक कार्य के रूप एक तीसरा पूर्णत: स्वदेशी एचआईवी-विरोधी कार्यक्रम शुरू किया जाना भी जरूरी है।
एचआईवी/एड्स निदान तथा पहचान
हमारी राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं के लिए एचआईवी के वास्ते एक लागत प्रभावी नैदानिक साधन का एक कार्यक्रम शुरू करना जरूरी है। यहां मैं आपके साथ एक भारतीय अनुभव पर चर्चा करूंगा। नेवा-एचआईवी एक ऐसा परीक्षण है जोकि रक्त की एक बूंद में तीन मिनट के भीतर एचआईवी/एड्स की पहचान कर सकता है। यह एक एकल कार्रवाई परीक्षण है जिसमें रक्त की एक बूंद कांच की एक स्लाइड पर एक अभिकर्मक की एक बूंद के साथ मिश्रित की जाती है। यदि रक्त के नमूने में क्लंपिंग हो जाती है तो इसका अर्थ है कि वह एचआईवी के लिए पाजीटिव है। रक्त की यह क्लंपिंग खुली आंख से देखी जा सकती है। यह परीक्षण नेवा-एचआईवी से युक्त रिकौम्बिनेंट प्रोटीनों का प्रयोग करता है और विश्व में यह ऐसे गिने-चुने परीक्षणों में से एक है जोकि उंगली में सुई चुभाकर निकाले गए रक्त की बूंद के जरिए सारे रक्त के लिए किया जा सकता है। हमारे देश में एचआईवी परीक्षण से जुड़ी व्यावहारिक कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया नेवा-एचआईवी परीक्षण किसी भी उपकरण के बिना किया जाने वाला परीक्षण है। इसके अलावा परीक्षण की सरलता और तेजी इसे, यहां तक कि हमारे देश के दूरस्थ हिस्सों में स्थित ग्राम्य प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में प्रयोग के लिए उपयुक्त बना देती हैं। यह अनूठी वैज्ञानिक प्रगति दिल्ली विश्वविद्यालय के जैव रसायन विभाग के संकाय सदस्यों द्वारा जैव-प्रौद्योगिकी विभाग और काडिला फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड, अहमदाबाद के सहयोग से संभव हो पाई है। मेरा सुझाव है कि स्वास्थ्य मंत्रालय को इस परीक्षण की प्रभाविता का अध्ययन करना चाहिए और यथाशीघ्र हमारे सभी सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों में इसे लागू करना चाहिए। महत्व का अगला क्षेत्र एचआईवी रोगियों से जुड़े लांछन को हटाना है।
निष्कर्ष
मैं विशेष रूप से माननीय संसद सदस्यों, अनुसंधान प्रयोगशालाओं और प्लाज्मा उद्योग को तथा स्वास्थ्य मंत्रालय को निम्न सुझाव देना चाहूंगा:
- अपने निर्वाचन क्षेत्र से एचआईवी/एड्स का नियंत्रण तथा निवारण अगले पांच वर्षों में अपने हाथ में लेने को एक महत्वपूर्ण मिशन समझें।
- ऐसा पाया गया है कि एचआईवी संक्रमण 15-29 वर्ष के आयुवर्ग में युवावर्ग के बीच 32% है तथा उनमें से 40% महिलाएं हैं। इस स्थिति पर विचार करते हुए संसद सदस्य अपने निर्वाचन क्षेत्र में सभी ग्रामीण युवावर्ग और महिलाओं के बीच एक संगठित जागरूकता अभियान चला सकते हैं ताकि एक सुसंगठित निवारण कार्यक्रम के माधयम से इस आबादी के बीच संक्रमण की रोकथाम संभव हो सके।
- सामाजिक संगठनों, चिकित्सा संस्थानों और सरकार की भागीदारी से किसी भी संदूषण के लिए रुधिर परीक्षण का एक तंत्र निर्मित करना और यह सुनिश्चित करना कि उनके निर्वाचन क्षेत्र में किसी भी ब्लड बैंक में संदूषित रुधिर भण्डार में न रखा जाए।
- अपने निर्वाचन क्षेत्र में मौजूद एचआईवी/एड्स से पीड़ित सभी व्यक्तियों को बच्चों के लिए स्कूली शिक्षा, ग्रामीण रोजगार, पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं, बैंक ऋण, प्रशिक्षण तथा रोजगार जैसी सभी सेवाएं निर्बाध रूप से उपलब्ध कराना सुकर बनाने पर विचार करें। ऐसा किए जाने से एचआईवी/एड्स प्रभावित व्यक्ति के जीवन स्तर में सुधार आ सकेगा और उन्हें इस बात का एहसास होगा कि वे समाज का एक अविभाज्य अंग हैं।
- अपने निर्वाचन क्षेत्र में लोकोपकारकों तथ एनजीओ की भागीदारी से ऐसे एचआईवी/एड्स प्रतिष्ठान के गठन पर विचार करें जोकि जरूरतमंद एचआईवी/एड्स रोगियों को अपने इलाज तथा जीवित रहने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान कर सकता है।
- देश में ऐसी कई रिपोर्टें हैं जिनके साथ ऐसे अनुभव जुड़े हुए हैं कि जड़ी-बूटियों से निकाली गई कतिपय परम्परागत दवाइयों में एचआईवी-विरोधी गुण हैं और वे उपचार कर सकती हैं। ऐसे अलग-अलग समूहों की पहचान करना तथा एचआईवी के इलाज और एचआईवी टीके के लिए दो अथवा तीन जड़ी-बूटी आधारित समाधान ढ़ूढ़ने के उनके कार्य में उन्हें प्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है।
अपने निर्वाचन क्षेत्रों को एचआईवी/एड्स से मुक्त करने के उनके सामाजिक मिशन के लिए सभी संसद सदस्यों को मेरी शुभकामनाएं। मेरा विश्वास है कि आपको देश के सभी नागरिकों द्वारा इस महान मिशन के प्रति आपके इस महत्वूपर्ण योगदान के लिए याद किया जाएगा।
ईश्वर आप पर कृपा करें। |