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प्रधानमंत्री द्वारा एशिया एड्स आयोग की रिपोर्ट का विमोचन

  प्रेस विज्ञप्तियां 

प्रधानमंत्री द्वारा एशिया एड्स आयोग की रिपोर्ट का विमोचन

नई दिल्ली, 30 जून, 2008 - भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने "रिडिफाइनिंग एड्स इन एशिया: क्राफ्टिंग इन इफैक्टिव रेस्पांस" (एशिया में एड्स को पुन: परिभाषित करना: एक प्रभावकारी प्रत्युत्तर तैयार करना) शीर्षक आयोग की रिपोर्ट का विमोचन किया। यह रिपोर्ट चेतावनी देती है कि कई एशियाई देश एड्स को लेकर अपने प्रत्युत्तर में पीछे छूट रहे हैं। प्रत्युत्तर के वर्तमान स्तरों पर, वर्ष 2020 तक 80 लाख एशियाई लोग एचआईवी से संक्रमित हो सकते हैं। अगर सरकारों ने नीतियां नहीं बदलीं तो तब तक एड्स भी वार्षिक रूप से अनुमानत: 500,000 जीवन समाप्त कर चुका होगा। ये एशिया स्वतंत्र एड्स आयोग द्वारा महाद्वीप में किये गये पहले विस्तृत अध्ययन के कुछ मुख्य निष्कर्ष हैं।

भारत में एशिया की एचआईवी से संक्रमित अनुमानित आबादी का आधा हिस्सा रहता है और वर्ष 2006 में अनुमानत: 25 लाख भारतीय एचआईवी के साथ जी रहे थे। नौ-सदस्यीय आयोग के अध्यक्ष और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष, डॉ. सी. रंगराजन के अनुसार, "ये आंकड़े हमारे सामने उपस्थित समस्या का संकेत हैं।" इसके साथ ही यह रिपोर्ट यह उल्लेख भी करती है कि भारत ने तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों में इस महामारी की गति को धीमा किया है।

आयोग ने - जिसमें एशिया के एड्स को लेकर काम करने वाले नौ अग्रणी आर्थिक अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक और नीति-निर्माता शामिल हैं - एशियाई देशों से एड्स को लेकर नया प्रत्युत्तर तैयार करने का आग्रह किया है। इस बात का उल्लेख करते हुए कि एशिया का प्रत्युत्तर एचआईवी की महामारी की नई वास्तविकताओं से न तो मेल खाता है और न ही उनके साथ-साथ आगे बढ़ रहा है, आयोग ने सिफारिश की है कि नीतियों में असुरक्षित व्यावसायिक यौन संपर्क, पुरुषों के बीच असुरक्षित यौन संपर्क और एक दूसरे की संदूषित सुइयों और सीरिंजों के उपयोग की दिशा में किये गये हस्तक्षेपों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। आयोग के अनुसार एशिया में हर यौनकर्मी के अनुमानत: 10 पुरुष ग्राहक हैं और इस तथ्य को देखते हुए असुरक्षित व्यावसायिक यौनकार्य करने वाले पुरुष "अधिकांश एशिया में एचआईवी की महामारी के आकार के संभवत: अकेले सर्वाधिक महत्वपूर्ण निर्धारक हैं।" आयोग का सुझाव है कि यौन व्यापार और नशीली दवाओं के उपयोग के संबंध में रोकथामकारी कार्यक्रमों पर व्यावहारिक रूप से ध्यान केंद्रित करके सरकारें इस महामारी को रोकने और कम करने की दिशा में पर्याप्त प्रगति करेंगी।

आयोग ने यह पाया है कि वर्तमान संसाधन न केवल अपर्याप्त हैं, बल्कि इस समय उनका उपयोग प्रभाव पैदा करने वाले प्राथमिकतापूर्ण हस्तक्षेपों के लिए नहीं किया जा रहा है। डॉ. रंगराजन ने बल देते हुए कहा, "जो देश इस महामारी के आरंभिक चरण में हैं उन्हें इस महामारी को कम करने के लिए औसतन प्रति व्यक्ति 50 सेंट व्यय करने की जरूरत है। आरंभिक रोकथाम पर खर्च किया गया हर डालर बाद में 8 डालर उपचार लागत की बचत करेगा। फिर भी, आयोग ने जिन देशों का सर्वेक्षण किया उनमें से भारत और चीन को छोड़ कर, अन्य देशों में गत दशक में राष्ट्रीय बजटों से एचआईवी कार्यक्रम पर व्यय राशि में कमी आई है।

आयोग ने अनुमान लगाया है कि इस महामारी को रोकने और कम करने पर इस क्षेत्र की संसाधन जरूरत 3.1 अरब डालर प्रति वर्ष है। किंतु दीर्घकालिक और विस्तारित प्रत्युत्तर के लिए 6.4 अरब डालर प्रति वर्ष की संसाधन जरूरत होगी।

यह उल्लेख करते हुए कि एचआईवी के रोगियों के प्रति लांछन की भावना भारत सहित एशिया की स्वास्थ्य देखरेख प्रणालियों का एक प्रमुख मुद्दा बनी हुई है, आयोग ने नागरिक समाज की अधिक सार्थक भूमिका और समुदाय-आधारित पहलकदमियों की सिफारिश की है। आयोग ने एशिया में मजबूत राजनीतिक इच्छा-शक्ति की जरूरत पर बल दिया। यदि नेतागण सीधे-सीधे एक विस्तारित प्राथमिकतापूर्ण प्रत्युत्तर को कार्यान्वित करें तो वे हर वर्ष 200,000 जीवनों को बचा सकते हैं और इस महामारी को कम करने में सफल हो सकते हैं।

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